Manikarnika Ghat: काशी का मणिकर्णिका घाट क्यों है विश्व प्रसिद्ध, इतिहास जानकर उड़ जाएंगे आपके भी होश
- byvarsha
- 01 Jul, 2026
pc: navarashtra
उत्तर प्रदेश के पुराने और कल्चरल शहर वाराणसी (काशी) में कई शानदार और धार्मिक घाट हैं। लेकिन, इन सभी घाटों में ‘मणिकर्णिका घाट’ को सबसे अनोखा और रहस्यमयी माना जाता है। यह सिर्फ़ एक घाट नहीं बल्कि हिंदू धर्म का सबसे बड़ा और पवित्र ‘महाश्मशान’ है।
मणिकर्णिका का इतिहास और पौराणिक कथाएँ
हिंदू पुराणों में ‘मणिकर्णिका’ नाम के पीछे बहुत दिलचस्प कहानियाँ हैं। एक कहानी के अनुसार, भगवान विष्णु ने कई सालों की तपस्या के बाद यहाँ एक तालाब (झील) बनाया था। जब भगवान शिव और देवी पार्वती इस तालाब के पास आए, तो भगवान शिव के खुशी के आँसुओं से तालाब भर गया। उसी समय, माँ पार्वती के कान का एक गहना, यानी ‘मणि’ (मणिकर्णिका), इस तालाब में गिर गया। तभी से इस जगह का नाम ‘मणिकर्णिका’ पड़ गया।
मोक्ष पाने का ‘मुक्तिधाम’
हिंदू धर्म में यह पक्का विश्वास है कि जिस व्यक्ति का शव मणिकर्णिका घाट पर जलाया जाता है, उसे सीधे ‘मोक्ष’ मिलता है। यानी, वह आत्मा जन्म-मरण के चक्कर से आज़ाद हो जाती है। काशी खंड किताब के अनुसार, जो व्यक्ति यहां शरीर छोड़ता है या जिसका यहां अंतिम संस्कार होता है, उसके कानों में खुद भगवान शिव ‘तारक मंत्र’ फूंकते हैं, जिससे उस आत्मा को मोक्ष मिलता है। इसी वजह से, पूरे भारत से बूढ़े और बीमार लोग अपने जीवन के आखिरी दिन बिताने के लिए काशी आते हैं।
मणिकर्णिका घाट की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यहां चिताओं की आग कभी नहीं बुझती। यह यहां साल के 365 दिन जलती रहती है। एक के बाद एक शव यहां लाया जाता है। हमारी आंखों के सामने जलती चिताओं, मंत्रों के जाप और गंगा के धीमे बहाव की वजह से यहां का माहौल एक ही समय में वैराग्य और शांति का एहसास कराता है।
घाट पर कुछ अनोखे रिवाज
इस घाट पर प्रचलित अनोखे रिवाजों में से एक है राख होली (मसान होली)। पूरे देश में जहां रंगों की होली खेली जाती है, वहीं काशी के मणिकर्णिका घाट पर रंगपंचमी के आसपास चिताओं की राख (भस्म) से होली खेली जाती है। माना जाता है कि भगवान शिव यहां अपने गणों के साथ होली खेलते हैं।
इसी तरह, चैत्र नवरात्रि के दौरान, देश के अलग-अलग हिस्सों से आने वाली शहर की लड़कियां (वेश्याएं) रात में भगवान शिव के दरबार में नाचती हैं। वे उस भगवान से प्रार्थना करती हैं कि अगले जन्म में उन्हें यह दलदली ज़िंदगी न मिले।
मान्यता के अनुसार, मणिकर्णिका घाट सिर्फ मौत का घाट नहीं है, बल्कि यह एक ऐसी जगह है जो इंसानी जीवन की नश्वरता और आध्यात्मिकता के सबसे ऊंचे लेवल को दिखाती है। यहां आने वाला हर इंसान दुनिया की माया को भूल जाता है और कम से कम कुछ समय के लिए वैराग्य का अनुभव करता है। गंगा के किनारे जलती चिताएं इंसान को जीवन के आखिरी सच से वाकिफ कराती हैं।
ऐतिहासिक विरासत और फिर से जीर्णोद्धार
मणिकर्णिका घाट को मॉडर्न और मजबूत लुक देने में मराठा साम्राज्य का बहुत बड़ा योगदान है। 18वीं सदी (लगभग 1730) में हमारे महाराष्ट्र के होलकर वंश की महान शासक, राजमाता अहिल्याबाई होलकर ने इस घाट का जीर्णोद्धार करवाया था। उन्होंने घाट की सीढ़ियाँ, मणिकर्णिका कुंड और आस-पास के मंदिर बनवाकर इस ऐतिहासिक और धार्मिक जगह को एक नई पहचान दी।
ऐसा माना जाता है कि मणिकर्णिका घाट इंसान को अहंकार और दुनिया की नश्वरता का एहसास कराता है। अमीर हो या गरीब, सब इसी राख में मिल जाएँगे, यह घाट हर पल यही शाश्वत संदेश देता है। इसलिए, काशी आने वाले हर तीर्थयात्री के लिए मणिकर्णिका घाट की यात्रा ज़िंदगी का एक यादगार और आँखें खोल देने वाला अनुभव है।






