प्रतापनगर विद्याश्रम के वार्षिकोत्सव ‘शौर्यगाथा’ में जीवंत हुई सम्राट पृथ्वीराज चौहान की वीरगाथा
- byrajasthandesk
- 04 Nov, 2026
शौर्य का शंखनाद: मंच पर जीवंत हुई पृथ्वीराज चौहान की वीरगाथा
भारतीय विद्या भवन विद्याश्रम, प्रतापनगर, जयपुर का 17वाँ वार्षिकोत्सव ‘शौर्यगाथा’ वीरता, पराक्रम और राष्ट्रगौरव की गौरवशाली परंपरा को समर्पित रहा। महान वीर योद्धा सम्राट पृथ्वीराज चौहान के जीवन, संघर्ष और अदम्य स्वाभिमान पर आधारित इस भव्य आयोजन ने दर्शकों को इतिहास के स्वर्णिम अध्यायों से रूबरू कराया।
कार्यक्रम का शुभारंभ भारतीय परंपरा एवं अनुशासन के सुंदर समन्वय के साथ हुआ। बैंड की मधुर एवं जोशीली धुनों के बीच एनसीसी कैडेट्स ने अनुशासित मार्च-पास्ट द्वारा मुख्य अतिथि का स्वागत किया। वैदिक मंत्रोच्चार एवं स्वस्तिवाचन के पश्चात मुख्य अतिथि द्वारा दीप प्रज्वलन कर समारोह का विधिवत शुभारंभ किया गया।
समारोह के मुख्य अतिथि प्रो. (डॉ.) प्रवीण चंद्र त्रिवेदी (पूर्व कुलपति, जय नारायण व्यास विश्वविद्यालय, जोधपुर एवं दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय, गोरखपुर) ने अपने प्रेरणादायी संबोधन में शिक्षा के साथ अनुशासन, परिश्रम एवं चरित्र निर्माण के महत्त्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने विद्यार्थियों को लक्ष्य निर्धारित कर दृढ़ संकल्प के साथ आगे बढ़ने तथा महान वीरों के जीवन से प्रेरणा लेने का संदेश दिया।
इसके पश्चात प्राचार्या ने वार्षिक प्रतिवेदन प्रस्तुत करते हुए विद्यालय की शैक्षणिक, सहशैक्षिक, खेलकूद एवं सांस्कृतिक उपलब्धियों का संक्षिप्त विवरण दिया तथा विद्यालय की प्रगति में सभी के योगदान की सराहना की।
समारोह की प्रथम सांस्कृतिक प्रस्तुति शिव वंदना रही। विभिन्न कक्षाओं के नन्हे विद्यार्थियों ने मनमोहक नृत्य एवं भावपूर्ण अभिव्यक्ति के माध्यम से भगवान शिव की आराधना की। भक्तिमय प्रस्तुति ने वातावरण को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर दिया और सांस्कृतिक यात्रा का शुभारंभ किया।
इसके पश्चात ‘आयो रे शुभ दिन आयो’ गीत पर पृथ्वीराज चौहान के जन्मोत्सव का मनोहारी नृत्य प्रस्तुत किया गया। राजस्थानी लोकसंस्कृति एवं पारंपरिक वेशभूषा से सजी इस प्रस्तुति ने वीर बालक के जन्म की खुशियों को साकार किया। वहीं, खली की दमदार धुन पर गौरी के प्रवेश का प्रभावशाली नृत्य मंचित किया गया, जिसने कार्यक्रम में नई ऊर्जा का संचार किया।
राजस्थान की समृद्ध लोकसंस्कृति को समर्पित घूमर एवं ‘अलबेलो सजन आयो री’ जैसी प्रस्तुतियों में छात्राओं ने पारंपरिक परिधानों और आकर्षक भाव-भंगिमाओं के साथ राजस्थानी संस्कृति की मनमोहक छटा बिखेरी। इन प्रस्तुतियों ने प्रदेश की आन-बान-शान और सांस्कृतिक विरासत को सजीव कर दिया।
कार्यक्रम में कथा के विभिन्न प्रसंगों को नृत्य, अभिनय, संगीत और काव्यात्मक संवादों के माध्यम से प्रस्तुत किया गया। पृथ्वीराज चौहान के जीवन के प्रमुख पड़ावों, संयोगिता प्रसंग, राजपूती स्वाभिमान, राजनीतिक संघर्ष तथा मोहम्मद गौरी के साथ हुए युद्धों का प्रभावशाली मंचन किया गया। हरिहर की प्रस्तुति सहित विभिन्न सांस्कृतिक प्रसंगों ने कथा को और अधिक रोचक बनाया।
कार्यक्रम का प्रमुख आकर्षण पृथ्वीराज चौहान एवं मोहम्मद गौरी के मध्य युद्ध का भव्य मंचन रहा। युद्धभूमि के दृश्य, सैनिकों की सजीव गतिविधियाँ, तलवारों की टकराहट और कलाकारों के उत्कृष्ट अभिनय ने दर्शकों को इतिहास के उस कालखंड का अनुभव कराया। इस प्रस्तुति में विद्यार्थियों का अनुशासन, समन्वय और परिश्रम विशेष रूप से दिखाई दिया।
नाटक का अंतिम प्रसंग चंद्रवरदाई रचित महाकाव्य ‘पृथ्वीराज रासो’ की प्रसिद्ध शब्दभेदी बाण की कथा पर आधारित था। गौरी के दरबार में बंदी पृथ्वीराज चौहान और उनके परम मित्र एवं कवि चंद्रवरदाई के ऐतिहासिक प्रसंग को प्रभावशाली संवादों एवं काव्यात्मक अभिव्यक्ति के साथ मंचित किया गया। चंद्रवरदाई के संकेतात्मक दोहे के माध्यम से पृथ्वीराज द्वारा शब्दभेदी बाण चलाने का दृश्य कार्यक्रम का चरमोत्कर्ष बना। इस प्रसंग ने मित्रता, स्वाभिमान और वीरता की भावना को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया।
इस संपूर्ण प्रस्तुति की विशेषता यह रही कि इतिहास को केवल घटनाओं के रूप में नहीं, बल्कि कविता, संगीत, नृत्य, संवाद और नाटकीय दृश्यों के माध्यम से जीवंत अनुभव बनाया गया। विद्यार्थियों ने अपने अभिनय और अभिव्यक्ति से यह संदेश दिया कि वीरता केवल शस्त्र उठाने में नहीं, बल्कि अपने मूल्यों, संस्कृति और स्वाभिमान की रक्षा करने में भी निहित है।
समारोह का समापन विद्यालय की उपप्रधानाचार्या द्वारा प्रस्तुत धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ। उन्होंने मुख्य अतिथि, विद्यालय प्रबंधन, अभिभावकों, शिक्षकगण, आयोजन समिति एवं सभी सहयोगियों के प्रति आभार व्यक्त किया। साथ ही, आयोजन को सफल बनाने में विद्यार्थियों की मेहनत, शिक्षकों के मार्गदर्शन और पर्दे के पीछे कार्यरत सभी सदस्यों के योगदान की सराहना की।
‘शौर्यगाथा’ केवल एक वार्षिकोत्सव नहीं, बल्कि भारतीय इतिहास, संस्कृति और राष्ट्रगौरव की विरासत को नई पीढ़ी तक पहुँचाने का सार्थक प्रयास रहा। इस आयोजन ने विद्यार्थियों को अपने गौरवशाली अतीत से प्रेरणा लेकर वर्तमान और भविष्य को बेहतर बनाने का संदेश दिया।
सचमुच, जब मंच पर इतिहास जीवंत हुआ और नन्हे कलाकारों ने अपनी प्रस्तुतियों से वीरता की विरासत को साकार किया, तब पूरा विद्यालय परिसर एक ही भावना से गूँज उठा।
“शौर्य की यह गाथा अमर रहे,
भारत का गौरव सदा अमर रहे।”
(डॉ. योजना शर्मा)
प्राचार्या






