नौरातें,जो सिर्फ पूजा नहीं, माँ की गोद काअहसास हैं

- करिश्मा

जब भी नवरात्रे आते है,घरों में एकअलग ही खुशबु फैल जाती हैं।सुबह-सुबह जलते हुए घी के दीये की महक,मंदिर से आती घंटियों की आवाज़और हवा में घुली हुई एक अजीब सी शांति। लेकिन सच कहूँ तो, नवरात्र सिर्फ नौ दिन का कोई नियम-कानून नहीं हैं। ये वे दिन हैं जब हम सब कहीं न कहीं उस माँ की तलाश करते हैं जो हमें बिना किसी शर्त के प्यार करती हैं।

अगर हम थोड़ा रुककर सोचे, तो हममें से हर कोई अपनी जिंदगी की भाग दौड़ में कहीं न कही थक चुका हैं। कोई नौकरी के तनावमें परेशान है, कोई घर परिवार की जिम्मेदारीके बोझ तले दबा है और कोई बस अपनों के बीच खुद को अकेला महसूस कर रहा है।ऐसेमें, जब ये नौ रातें आती हैं,तो ऐसा लगता है जैसे ब्रह्मांडकी सबसे बड़ी माँ ने अपनी बाहें फैला कर हमें पुकार करबोला हो-“डर मत,मैं हूँ ना”।

अन्दर का महिषासुर और हमारा रोज का संघर्ष 

हम पुराणों में महिषासुर की कथा पढ़ते हैं कि कैसे एक शक्तिशाली राक्षस ने सबका जीना मुश्किल कर दिया था। लेकिन क्या हमने कभी अपने अन्दर झाँककर देखा हैं? वह महिषासुर कोईपरलोकसेआयाराक्षसनहींहैं, वह आधुनिकयुगकावह‘तनाव’और‘अति-विचारशीलता’हैंजोहमारीरातोंकीनींदछीनलेताहैं।

वहगुस्सा, जोबात-बातपरअपनोंपर निकल जाता हैं,

वह डर, जो हर वक्तअन्दर ही अन्दरहमेंखाता रहता हैं,

वह अहंकार, जो हमें झुकने औरगलतीमाननेनहींदेता,यही तो हमारे अन्दर के राक्षस हैं।और जब हम इन नौ दिनों में माँ की पूजा करते हैं,व्रत रखते हैं, तो असल में हम अपने अन्दर की उस कमज़ोरी को हराने की कोशिश कर रहे होते हैं।हम माँ से कहते हैं “माँ अब थक गए हैं इन बुरी आदतों से लड़ते-लड़ते अब तू ही सम्भाल ले”।

नवदुर्गा:ममता के नौ अलग- अलग रंग 

माँ के ये नौ रूप कोई किताबी बातें नहीं हैं, यह तो हमारे जीवन के अलग-अलग पड़ावों जैसे हैं:

  • शैलपुत्री की तरह हम जिंदगी में हर बार गिरकर फिर से उठना सीखते हैं।
  • ब्रह्माचारिणी की तरह चुप चाप अपनी मेहनत और तपस्या में लगे रहते हैं,बिना किसी शोर के।
  • स्कंदमाता की तरह जब हम अपने बच्चों को सीने से लगाते हैं, तो हमें समझ आता है कि ममता असल में होती क्या है।
  • और जब कभी जिंदगी बहुत अंधेरी लगने लगती हैं,तो कालरात्रि बनकर माँ हमें यह सिखाती हैं कि अंधेरे के बाद ही उजाला आता हैं।

ये नौ देवियाँ आसमान मैं बैठी कोई मूर्तियाँ नहीं हैं।ये हमारे ही घर की उन महिलाओं-माँ,बहन,बेटी,पत्नीका अक्स हैं जो खुद भूखी रहकरसबको खिलती हैं,जो खुद दर्द सहकर परिवार को हँसाती है। जब हम कन्या पूजन में छोटी बच्चियों के पैर धोते हैं,तो सच पूछिये तो हम अपनी ही आने वाली पीढ़ी को यह एहसास करा रहे होते है कि उनका होना इस दुनिया की सबसे बड़ी नेमत हैं।

खुद से जुड़ने का मौका 

लोग कहते है की नवरात्र में उपवास रखने से शरीर डीटॉक्स होता है, सेहत अच्छी रहती हैं। बात बिल्कुल सही है। लेकिन मुझे लगता है कि इससे भी ज्यादा हमारी आत्मा का डीटॉक्सहोता हैं।

पूरे साल हम दुनिया भर की फ़ालतू की बातें,शिकायतें और भागदौड़ में उलझे रहते हैं। ये नौ दिन हमें रुकना सिखाते हैं। थोड़ा थमकर सास लेना सिखाते हैं। घर की साफ़ सफाई के बहाने हम अपने मन की जमा धूल को भी झाड़ देते हैं। दो वक़्त की रोटी छोडकरजब हम सिर्फ फलाहार या सात्विक भोजन करते हैं, तो शरीर हल्का हो जाता हैं और मन में एक अजीब सा ठहराव आजाता हैं।

अंत में

ये नौ रातें हमें सिर्फ ये याद दिलाने आती है कि अंधेरा चाहे कितना भी गहरा क्यूँ न हो,उजाला हमेशा जीतता हैं। जब हम इन दिनों में दिया जलाते हैं,तो वह सिर्फ मिट्टी के दीये की लौ नहीं होती, वह आपके उस विश्वास का दिया होता हैं जो आपको अन्दर से कमज़ोर नहीं होने देता।इसनवरात्र मेंसिर्फ पूजा की औपचारिकता न निभाये,थोड़ा वक्त खुद के साथ बैठिए,अपनी कमजोरियोंको गलेलगाइएऔर महसूस कीजिए कि कोई हैं जो बिना कुछ कहे, आपकी हर अनकही बातसुन रहा हैं।

तोइसबारजबआपकलशस्थापनाकरें,  तोसिर्फबाहरीअनुष्ठाननकरें—अपनेभीतरकीदेवीकोजगाएं।क्योंकिमाँका होना ही इस बात का एहसास कराता है कि आप अकेले नहीं हैं।

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  • करिश्मा