Kailash Mansarovar Yatra: लिपुलेख दर्रा से गुजरने वाली कैलाश मानसरोवर यात्रा पर नेपाल ने जताई आपत्ति, भारत ने दिया सीधा सा...

इंटरनेट डेस्क। कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिए तैयारी शुरू हो चुकी है। इस बीच खबर हैं की भारत और नेपाल सरकार के बीच फिर विवाद देखने को मिला है। नेपाल की नई बालेन शाह सरकार ने एक बार फिर से रविवार को मानसरोवर यात्रा को लेकर सीमा संबंधी दावों को उठाया है। जिस पर भारत की विदेश मंत्रालय ने अपनी प्रतिक्रिया दी है। भारतीय विदेश मंत्रालय ने कहा है कि लिपुलेख पास साल 1954 से कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिए एक स्थापित रास्ता है और इस रास्ते से पिछले कई दशकों से यात्रा लगातार जारी है, यह कोई नया घटनाक्रम नहीं है।

नेपाल ने की टिप्पणी
मीडिया रिपोटर्स की माने तो विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने रविवार  को नेपाल के विदेश मंत्रालय की ओर से कैलाश मानसरोवर यात्रा के संदर्भ में की गई टिप्पणी पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि इस मुद्दे पर भारत का रुख हमेशा स्पष्ट और स्थिर रहा है। उन्होंने कहा कि लिपुलेख दर्रा साल 1954 से कैलाश मानसरोवर यात्रा का एक स्थापित रास्ता रहा है और इस रास्ते से कैलाश मानसरोवर जाने वाले यात्रियों की यात्रा पिछले कई दशकों से लगातार जारी है। उन्होंने कहा, ‘सीमा को लेकर किए जाने वाले दावों के संबंध में भारत ने हमेशा यही कहा है कि ऐसे दावे न तो सही हैं और न ही ऐतिहासिक तथ्यों और सबूतों पर आधारित हैं।

नेपाल ने क्या कहा
मीडिया रिपोटर्स की माने तो विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा, भारत अपने पड़ोसी देश नेपाल के साथ द्विपक्षीय संबंधों के सभी मुद्दों पर रचनात्मक संवाद के लिए तैयार है, जिसमें सहमति से लंबित सीमा विवादों को बातचीत और कूटनीति के माध्यम से सुलझाना भी शामिल है। वहीं नेपाल के विदेश मंत्रालय ने रविवार  को लिपुलेख से होकर गुजरने वाली कैलाश मानसरोवर यात्रा को लेकर भारत को एक प्रोटेस्ट नोट लिखा। इसमें नेपाली विदेश मंत्रालय ने कहा कि नेपाल ने अपनी चिंता भारत और चीन के साथ साझा की है। 1816 की सुगौली संधि के मुताबिक लिम्पियाधुरा, लिपुलेख और कालापानी का इलाका नेपाल के संप्रभु क्षेत्र का हिस्सा है। नेपाल ने यह भी कहा कि वह पहले भी भारत से इस इलाके में सड़क निर्माण, व्यापार, पर्यटन और तीर्थयात्रा जैसी एक्टिविटी न करने की अपील करता रहा है।

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