महाभारत में युद्ध से पहले शंखनाद क्यों किया गया था? जानिए धार्मिक और पौराणिक कारण
- byvarsha
- 08 May, 2026
PC: navarashtra
भारतीय संस्कृति में शंख को बहुत पवित्र और शक्तिशाली माना जाता है। कई जगहों पर शंख बजाया जाता है जैसे भगवान की पूजा, आरती, यज्ञ, मंदिरों में शुभ काम या जीत के मौकों पर। लेकिन पुराने समय में युद्ध के मैदान में भी शंख बजाने का खास महत्व था। युद्ध शुरू होने से पहले सेना में जोश भरने, दुश्मन में डर पैदा करने और जीत का संदेश देने के लिए शंख बजाया जाता था।
युद्ध में शंख बजाने का ज़िक्र महाभारत, रामायण और कई पुराणों में मिलता है। यह सिर्फ़ एक आवाज़ नहीं थी, बल्कि इसे धर्म, बहादुरी, आत्मविश्वास और दैवीय शक्ति का प्रतीक माना जाता था।
शंख का धार्मिक महत्व
हिंदू धर्म में शंख को भगवान विष्णु का हथियार माना जाता है। भगवान विष्णु अपने चार हाथों में से एक हाथ में शंख धारण करते हैं। शंख से निकलने वाली आवाज़ का संबंध “ॐ” के अधनाद से माना जाता है। इसलिए शंख बजाना शुभ, पवित्र और बुरी ताकतों को दूर करने वाला माना जाता है।
शास्त्रों के अनुसार, शंख बजाने से माहौल से नेगेटिव एनर्जी दूर होती है और पॉजिटिव एनर्जी जागती है। युद्ध जैसी भयानक स्थिति में सैनिकों में हिम्मत और आत्मविश्वास जगाने के लिए शंख बजाना ज़रूरी माना जाता था।
युद्ध में शंख क्यों बजाया जाता था?
पुराने ज़माने में युद्ध शुरू होने का ऐलान करने के लिए कोई मॉडर्न औज़ार नहीं थे। इसलिए, सेना को यह इशारा देने के लिए शंख बजाया जाता था कि युद्ध शुरू हो गया है। शंख की आवाज़ दूर तक पहुँच सकती थी, इसलिए पूरी सेना को एक ही समय में मैसेज मिल जाता था।
महाभारत में, कुरुक्षेत्र युद्ध की शुरुआत में, श्री कृष्ण, अर्जुन, भीष्म, दुर्योधन और दूसरे योद्धाओं ने अपने शंख बजाए थे। उस शंख ने औपचारिक रूप से युद्ध शुरू किया था।
सैनिकों में जोश पैदा करने के लिए
शंख की गंभीर आवाज़ सैनिकों में वीरता की भावना जगाती थी। युद्ध के दौरान डर, तनाव और मौत की संभावना रहती है। ऐसे समय में, शंख बजाने से सैनिकों में आत्मविश्वास और लड़ने की एनर्जी पैदा होती थी। शंख बजाना जीत का ऐलान माना जाता था। इससे सेना का हौसला बढ़ता था।
दुश्मन के मन में डर पैदा करना
एक बड़ी सेना का मिलकर शंख बजाना बहुत बड़ा और डरावना लगता था। इससे दुश्मन के मन में साइकोलॉजिकल प्रेशर बनता था। यह युद्ध शुरू होने से पहले ही विरोधी सेना पर साइकोलॉजिकल असर डालने का एक असरदार तरीका था। देवताओं को साक्षी मानकर शंख बजाना युद्ध का ऐलान माना जाता था।
जीत का मैसेज देने के लिए
युद्ध जीतने के बाद भी शंख बजाया जाता था। यह जीत, पराक्रम और खुशी ज़ाहिर करने का एक तरीका था। जब किला जीत लिया जाता था, दुश्मन हार जाता था या राजा जीत जाता था, तो शंख और ढोल बजाए जाते थे।
महाभारत का मशहूर शंख
महाभारत में हर बड़े योद्धा के पास एक अलग शंख होता था। उनके नाम भी खास थे।
भगवान कृष्ण — पंचजन्य
अर्जुन — देवदत्त
भीम — पौंड्र
युधिष्ठिर — अनंतविजय
नकुल — सुघोष
सहदेव — मणिपुष्पक
भगवद गीता के पहले अध्याय में इस शंख का बहुत प्रभावशाली वर्णन है। कहा जाता है कि इसकी बहुत बड़ी ध्वनि ने कौरवों के दिलों में डर पैदा कर दिया था।
रामायण में शंख
रामायण में भी युद्ध के दौरान ढोल, तुरही और शंख बजाने का ज़िक्र है। श्री राम की सेना में वानर सेना युद्ध के दौरान जयकारे लगाती थी और शंख बजाती थी। इससे सेना में जोश पैदा होता था। पहले के समय में शंख बजाना सिर्फ़ एक धार्मिक काम ही नहीं था, बल्कि इसे मानसिक और शारीरिक शक्ति बढ़ाने का एक ज़रिया भी माना जाता था।
भारतीय संस्कृति में शंख बजाना सिर्फ़ एक धार्मिक रस्म ही नहीं थी, बल्कि यह युद्ध की रणनीति, मानसिक शक्ति, धार्मिक आस्था और सामूहिक प्रेरणा का एक अहम हिस्सा था। युद्ध के समय शंख बजाने का इस्तेमाल सैनिकों का हौसला बढ़ाने, दुश्मन पर साइकोलॉजिकल असर डालने और धर्म की रक्षा की भावना जगाने के लिए किया जाता था।





